संपादकीय

news portal lucknow

यूपी के पत्रकारो के लिये कुछ अहम विंदु को लेकर एनेक्सी मीडिया सेंटर लखनऊ में प्रेस वार्ता करते हुये वरिष्ठ पत्रकार प्रभात त्रिपाठी के अहम सवाल।
प्रभात त्रिपाठी
21 Mar 2018
यूपी के पत्रकारो के लिये कुछ अहम विंदु को लेकर एनेक्सी मीडिया सेंटर लखनऊ में प्रेस वार्ता करते हुये वरिष्ठ पत्रकार प्रभात त्रिपाठी के अहम सवाल।

मेरे प्रिय सम्मानित सभी उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त पत्रकार भाईयों।

1.पत्रकारों के हितों के लिये बनी चार दशक से अधिक समय से चली आ रही उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति का वर्तमान स्वरूप किन कारणों से बिगड़ गया है कि आपस में एक दूसरे के प्रति नफरत जेसा माहौल खड़ा हो गया है। और यह समिति दो गुट में बट गई थी और अब फिर से किचकिच शुरू हो गई है। इस पर क्या हम सभी सम्मानित पत्रकार भाईयों को आत्ममंथन करने की जरूरत नहीं है? मेरे इस अहम विंदु से लोग सहमत होगें।

2.समय से इस समिति की आम बैठक क्यों नहीं होती है। और बार-बार क्यो कहना पड़ता है कि समय पूरा होने के बाद भी चुनाव नहीं कराये जा रहे है। चुनी हुई समिति पहले से ही इस कबायद को स्वंय क्यों नहीं करती यह अहम सवाल कब खत्म होगा।

3.समिति को लाभ का पद क्यों बना दिया गया है कि इस समिति का पदाधिकारी मान्यता समिति में जायेगा। इसे क्यों न समाप्त किया जाये। पुराने स्वरूप मे ही समिति काम करे। पत्रकार हितों से यह समिति सरकार से कोई समझौता न करे।

4. सरकार और पत्रकार के बीच के सामजंस को कुछ लोग अपने स्वार्थ में इतना खराब कर चुके है कि सरकार व अधिकारी जब चाहते है पत्रकारोे के हितों को हाइजैक करके रोज नया बबेला खड़ा कर देते है। चाहे सरकारी मकान का मामला हो या फिर पत्रकारों को मिलने वाली सुविधाओं से जुड़े सवाल हो। इस पर सरकार लगातार पत्रकारों के साथ सोतेला ब्यवहार कर रही है। कोई सुनने वाला नहीं है। मकान का नवीनीकरण का ममला हो या फिर पत्रकार योजना का मामला हो या फिर पत्रकारोे के वेलफेयर का मामला हो इस पर सरकार लगातार हम पत्रकार भाईयों को परेशान कर रही है। यह समस्या एकजुट होकर ही दूर होगी। इस पर एक बड़े आदोंलन की जरूरत है। सभी भाई इस गंभीर समस्या को समझे।

5. समिति का पुराना स्वरूप क्यों वाहाल नहीं हो पा रहा है। क्या आपसी इगो हम आपका इतना नहीं बढ़ गया है कि हम सीनियर युवाओं के साथ लगातार छोटे-बड़े पत्रकार होने का भेदभावरखते है। इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। चाहे फोटोग्राफर हो या फिर चैनल के कैमरामैन हो या प्रिंट मीडिया के पत्रकार भाई हो सभी बराबरी से सम्मान के हकदार है।

मेरा यह मानना है कि राज्य मुख्यालय के कार्ड का वजन बराबर है। सभी पत्रकार भाई एक समान है जिनके पास मान्यता कार्ड है वह सभी बरबारी के हकदार है। इस भेदभाव को क्या लखनऊ की पत्रकारिता से खत्म नहीं किया जा सकता। इसके अलावा किसी भी राज्य में यह भेदभाव नहीं है।

नया पत्रकार-युवा पत्रकार या फिर सीनियर पत्रकार हम सभी एक है। हमारे सीनियर या फिर बड़े समाचार पत्र के पत्रकारों को इस भेदभाव को जल्द से जल्द दूर करके एक सौहार्द वातावरण बनान होगा तभी यूपी के राज्य मुख्यालय के पत्रकारों के बीच बढ़ती खाई को पाटने का काम हो सकेगा। यह समस्या सबसे बड़ी समस्या है जो नासूर बन चुकी है।इसे दूर करै।

6.सबसे अहम विंदु एक खड़ा हो रहा है वह यह है कि हम सभी भाईयों के बीच एक ऐसी आचार संहिता होनी चाहिये कि जिसका पालन सभी पत्रकार भाई करे। जो न करे उसे अपनी विरादरी के बीच बैठाकर चिन्हित करके कार्यवाही करे।

1.हम सभी भाई बहनों को अपनी सम्पत्ति का एलान स्वंय करना होगा।

2.सरकार की सुविधाओं का लाभ सभी पत्रकार भाईयों को बराबरी से मिले।

3.कोई संगठन स्वंयभू न बने। पत्रकार हित में सभी संगठन एकजुट होकर सभी को लेकर एक साथ चले।

4.एक आचार संहिता बने जिसमें सभी पत्रकार उसके अंदर आये। अपने फोरम मे बैठकर मिल जुलकर एक समस्या का समाधान करने का प्रयास करे। सोशल मीडिया वाॅटसअप मे चेटिंग किच-किच से बचे। जो ऐसा करते पाया जाये उसके खिलाफ कठोर कार्यवाही आपस में बैठकर तय करे।

5.प्रेस क्लब का सभी को सदस्य बनाया जाये। जो जिला लखनऊ के मान्यता प्राप्त पत्रकार हो या फिर राज्य मुख्यालय के।

6.बीमा पाॅलसी का लाभ सभी पत्रकारों को बराबरी से मिले। किसी के साथ भेदभाव न हो।

7.हर माह एक बैठक सभी पत्रकारों के साथ खुले मंच पर हो।

8.समिति एक जुट होकर नया चुनाव कराये। चुनाव ईवीएम मशीन से हो। चुनाव अधिकारी सूचना निदेशक हो।

9. प्रमुख सचिव सूचना की निगरानी में चुनाव हो। पारदर्शिता से कोई समझौता न हो।

10. सभी युवा पत्रकारों के साथ बैठकर उनके दुख दर्द को सीनियर पत्रकार समझे। हर माह काउसलिंग हो।

7.पत्रकारों के हितो को लेकर हमारे मौजूदा संगठन जो अब लगातार निष्क्रिय हो रहे है उन्है उस पर अपनी पहल मजबूती से करनी होगी। प्रेस काउसिंल कुछ नहीं करती समय-समय पर प्रेस काउसिंल को हम निर्वाचित अध्यक्ष व सचिव को एक पत्र इस आसय का लिखते रहना चाहिये कि संगठन व प्रेस काउसिंल सभी देश के पत्रकार व यूपी के पत्रकार जिन पर रोज सरकारी हमले होते है उसके लिये आगे आये और कठोरता से आवाज उठाकर होने वाले आदोंलन के साथ खड़ा हो।

8.सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग पत्रकारों के लिये होता है। सुनिश्चित किया जाये कि सूचना अधिकारी से लेकर अधिकारी पत्रकारो के लिये सजग रहे। जैसे प्रेस कार्ड/प्रेस कावरेज की सूचना/सरकारी कार्यक्रमों की सूचना/व मुख्यमंत्री की प्रेस वार्ता इन सभी कार्यक्रमों के लिये पत्रकारों को काफी जूझना पड़ता है। सूचना अधिकारी पूरी तरह से काम नहीं करते। पत्रकारों को फोटोग्राफरों को व चैनल के लोगों को बेइज्जत होना पड़ता है। सीनियर पत्रकार तो बेइज्जती के कारण उन समारोह मे जाते ही नहीं है। क्योकि सम्मान पूर्वक ब्वहार नहीं होता। सूचना निदेशक/प्रमुख सूचना सचिव को सुनिश्चत करना होगा कि वह इस बारे में गम्भीरता से ध्यान दे। पत्रकार सम्मान का भूखा होता है।

9. देश के सभी संगठनों व पत्रकार समिति को चाहिये कि सभी समाचार पत्र पर हो रही परेशानी को मुखर होकर एकजुट होकर उसकी आवाज में शामिल हो। चाहे छोटा समाचार पत्र हो या फिर बड़ा समाचार पत्र हो। सभी की एक समस्या है कि अखवार छपे कैसे। अखवार या चैनल नही रहेगें तो उसका रिपोर्टर या फोटोग्राफर सा कैमरामैन भी नहीं रहेगा। इस लिये डीएवीपी की पाॅलसी 2016 को रद्द कराये। बीच में कई समाचार पत्र बन्द हो गये है या फिर आर्थिक अभाव में बंदी की कगार पर है।

10. न्यूज प्रिंट से 5 प्रतिशत जीएसटी को अगर तत्काल जीएसटी से मुक्त नहीं कराया गया तो आने वाले समय में चाहे छोटे समाचार पत्र हो या फिर बड़े सभी बंद हो जायेगें। क्या इस गंभीर समस्या को लेकर देश के काई भी संगठन/समिति इस पर बड़ा आदोंलन नहीं कर सकती। यह एक गंभीर समस्या है। कोई पत्रकार चाहे मान्यता प्राप्त पत्रकार हो या फिर गैर मान्यता प्राप्त पत्रकार जब अखबार बंद हो जायेगें तो पत्रकार नहीं रहेगा। इस गंभीर समस्या को लेकर मौजूदा पत्रकार संगठन आदोंलन करे। और वित्त मंत्री अरूण जेटली व जीएसटी काउंसलि चैयरमैन के सामने एक मेमोरेन्डम देकर न्यूज प्रिंट को 5 पतिशत जीएसटी के स्लैब से मुक्त कराये। गंभीर समस्या है। इस पर तत्काल सभी प्रकाशक/मुद्रक की एक मीटिंग में अप्रेल माह में बुलाने का प्रयास करूंगा।

11. सभी अखवार मालिक या चैनल मालिक अपने रिपोटरों के हितों का घ्यान रखे। पत्रकार अपनी कलम से जो लिखता है वह समाज को नई दिशा देता है। पत्रकारों के हितों के लिये स्वंय अखवार मालिको को देखना चाहिये कि एक तरफ वह सरकार से मार खा रहा है दूसरी तरफ से आपका भी शिकार हो तो उसके बच्चे क्या करेगें।इस लिये अखवार को ब्यवसाय के रूप में अगर आप लाभ लेते है तो उसका कुछ हिस्सा सम्मानपूर्वक रिपोर्टरों को भी मिले। जिससे उनकी अजीवका सही तरह से चले।

12.सरकार के किसी भी लाभा के लिये पत्रकारों को आगे नहीं भागना चाहिये। एक ऐसे नार्मस बने जिससे सरकार उस अखवार मालिकों व रिपोर्टरों के सामने झुक सके। हमे लाभ के लिये अपनी कीमत पर कोई समझौता नहीं करना चाहिये। हर सरकार कहती है आप चार लोग आ जाओं बात कर लो। बात सभी को विश्वास में लेकर होनी चाहिये। चाहे मकान का नवीनीकरण हो या फिर स्वास्थ बीमा का मामला हो या फिर अन्य मामले। पारदर्शिता के साथ न्याय पूर्वक काम हो।

13. सबसे अहम यह है कि जो पत्रकार पूरे जीवन काम करता है फिर वह स्वर्ग को सिधार जाता है यानी कि उसका निधन हो जाता है। उसके निधन के बाद तत्काल उसके परिवार को बिना भेद भाव के कुछ राशि सूचना विभााग के पत्रकार वेलफेयर निधि से मिल जानी चाहिये। बाद में उसके लिये सरकार द्वारा दी जाने वाली एक मुश्त राशि स्वतःसमय जो निर्धारित हो मिल जाना चाहिये। किसी को इसके लिये पिक एण्ड चूस के आधार पर प्रयास न करने पडे। सभी पत्रकार चाहे रिपोर्टर हो या फिर कैमरामैन हो या फिर फोटोग्राफर हो। सभी बराबर है। इस काम को सूचना विभाग संवदेना पूर्वक अपना निर्वाहन करे।अंत में मै सिर्फ यही कहूंगा कि जल्द से जल्द एक कमेटी एकजुट होकर अप्रेल में चुनाव कराकर यह साबित कर दे कि यूपी की पत्रकारिता अब पूरी तरह से एकजुट है। अगर कोई जीवीएम नहीं मानता है तो बैठकों का कोई औचित्य नहीं है। चुनाव का एलान मै कर रहा हूॅ। 7 अप्रेल 2018 दिन रविवार को चुनाव करा लिया जाये अगर सभी सहमत हो तो इस पर मुहर लगाकर इसका एलान कर दिया जाये। धन्यवाद

प्रभात कुमार त्रिपाठी (राज्य मुख्यालय पत्रकार) कार्ड संख्या 150 मोबाइल 9450410050


news portal lucknow

मोदी के सपनों को साकार करते यूपी के मुख्यमंत्री योगी
प्रभात त्रिपाठी
19 Feb 2018
मोदी के सपनों को साकार करते यूपी के मुख्यमंत्री योगी

इसी का गवाही बनने जा रही है इनवेस्टर समीट लखनऊ 2018

अब तक 950 से अधिक एमओयू में हुये हस्ताक्षर,

लगभग डेढ़ लाख करोड़ का पूंजी निवेश हो सकता है यूपी मे

न्यू इडिया बनाने का जो सपना देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देखा था उसे अगर उत्तर प्रदेश से शुरू किया जाये जो काबिले तारीफ होगा। जिस यूपी ने इस देश को कई प्रधानमंत्री दिये हो और वर्तमान में वराणसी की धरती से प्रधानमंत्री मोदी सांसद के रूप में चुने गये है तो उस यूपी की अगर काया कलप नहीं बदली जाती है तो उस सरकार पर तोहमत भी लगनी शुरू हो जाती है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस विश्वास के साथ एक संत को इस बड़े सूबे की कमान इस विश्वास के साथ सौपी हो कि उसका मुख्यमंत्री 22 करोड़ की जनता के सपने को साकार करेगा उसमें योगी जी पूरी तरह से कड़ी मेहनत के साथ अपने मात्र 11 माह के कार्यकाल में सफल मुख्यमंत्री माने जा सकते है। दिन-रात काम करके मुख्यमंत्री योगी 2019 के मिशन को कामयाबी की और ले जाने के लिये आतुर दिखाई दे रहे है। प्रदेश का सबसे बड़ सेक्टर अगर कोई है तो वह है प्रदेश में उघोगों की स्थापना करना और प्रदेश में बाहर से पूजनिवेश का होना माना जाता है। उसी कड़ी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने नवाबो की नगरी लखनऊ में 21-22 फरवरी को एक मंच में देश विदेश के हजारों उघोगपतियों को लाकर यूपी में इनवेस्टर समीट का आयोजन किया है जो अपनी सफलता के लिये आतुर हैै।

कल सुबह यानी 21 फरवरी को जब इंदिरागांधी प्रतिस्ठान में देश के प्रधानमंत्री मोदी जी के सामने कई देशों के नामी उधोगपति व कई कम्पनियो के सीइओं उपस्थित होगें। इस सफल आयोजन में प्रदेश के कई विभाग व जिला प्रशासन सहित सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग जुटा हुआ है। पिछले कई माह से विदेश सहित भारत के कई बड़े शहरों में इनवेस्टर मीट के आयोजन के लिये रोड शो भी आयोजित किये गये थे। मुम्बई में भी एक इनवेस्टर समीट का आयोजन किया गया था। यूपी का क्या मिला और क्या मिलेगा इसकी समीक्षा 22 फरवरी के बाद निश्चित तौर पर की जायेगी। मीडिया इसका आत्ममंथन भी करेगा। लेकिन मुख्यमंत्री योगी जी का आगाज काफी शानदार होने जा रहा है। अब इसका अंत भी प्रदेश की जनता के लिये भारी पूंजी निवेश को लेकर जरूर देखा जा सकता है। जिस प्रदेश में अगर युवाओं के दो हाथों का रोजगार मिल जाये समझों उस प्रदेश की सरकार सफल सरकार मानी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह न्यू इंडिया,मेक इन इंडिया,स्टार्टअप इंडिया बनाने का सपना देखा था कि देश के युवाओं के हाथों में रोजगार हो उस सपने की शुरूआत उत्तर प्रदेश की इनवेस्टर समीट से होने जा रही हैै। निश्चित तौर पर यूपी की योगी सरकार की शुरूआत अच्छी होने जा रही है जिसकी तरीफ करनी होगी। सरकार का यह बहुत बड़ा आयोजन है। जिसमेे प्र्रदेश के औधोगिक विकास व पर्यटन की भूमिका बहुत बडी है। यूपी के पर्यटन विभाग ने तो अपने स्लोगन में लिखा है जिसने ‘‘यूपी नहीं देखा उसने इंडिया नहीं देखा’’। इस सरकार ने लगातार जबसे सत्ता सम्हाली है तब से पूरे प्रदेश की उस परम्परोओं को जीवित करने का भी प्रयास किया है जो भारत की मूल संस्कृत थी। धार्मिक स्थानों को ठीक करके उन स्थानों में जो धार्मिक मान्यताओं के आधार पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना तथा प्रदेश में विजली पानी सड़क शिक्षा किसानों की समस्था तथा बेरोजगारों के लिये रोजगार कर सृजन करना शामिल है। यूपी को पर्यटन के क्षेत्र मेे मजबूत बनाने के लिये पर्यटन मंत्री रीता जोशी बहुुगुणा के साथ-साथ प्रमुख सचिव पर्यटन अवनीश अवस्थी ने जिस तालमेल के साथ मिलकर अब तक काम किया है उसकी तारीफ की जानी चाहिये। खुद वाकौल मंत्री रीता जोशी ने खुद प्रमुख सचिव अवनीश अवस्थी को एक डायनमिक अधिकारी बताया। वहीं प्रदेश में उघोगों के लिये जिस तरह से औधोगिक मंत्री सतीश महाना के साथ मिलकर अवस्थापना एवं औधोगिक विकाश आयुक्त अनूप चन्द्र पाण्डेय ने कंधे से कंधा मिलाकर अब तक 11 माह से काम सम्हाला है वह काबिले तारीफ कहा जा सकता है। इनवेस्टर समीट का आयोजन उनकी अथक मेहनत से सफलता के आयाम चूमने को तैयार है। रात दिन एक करके प्रमुख सचिव सूचना अवनीश अवस्थी व सूचना निदेशक अनुज झा ने इनवेस्टर समीट का सफल आयोजन किया और मीडिया में इसका ब्यापक प्रचार-प्रसार किया यह भी समफलता की कड़ी मेे एक अहम कड़ी माना जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी सहित देश के माननीय राष्ट्पति व कई देशों के मंत्री व बड़ी बड़ी कम्पनी के सीईओं नवाबों की नगरी लखनऊ को देखने व उसकी नवाबी संस्कृत का दीदार करने राजधानी के विभिन्न पांच सितारा होटलों में पंहुच गये है। 21 फरवरी का सूरज निश्चित तौर पर यूपी के विकास की उस गाथा को लिखने के लिये तैयार हो जायेगा जिसको लिखने के लिये कई माह से इस इनवेस्टर समीट 2018 का आयोजन किया जा रहा है। इनवेस्टर मीट कितनी सफल होगी कितनी असफल इसका अगला सर्वेक्षण 24 फरवरी को फिर किया जायेगा लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि इनवेस्टर समीट 2018 यूपी सरकार व प्रधानमंत्री मोदी के सपनो को साकार करने में मील कर पत्थर साबित होने जा रही है।


news portal lucknow

जब भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश ने नाराज चचा शिवपाल यादव को फोन किया...
प्रभात त्रिपाठी
28 Jun 2016
लखनऊ। चचा-भतीजे की नाराजगी का एपीसोड पिछले एक सप्ताह से राजधानी लखनऊ के राजनेतिक गलियारों में मीडिया के लिये दिलचस्प खबरों का संकलन बना रहा जो अभी भी अंदरूनी तौर पर जारी है। यह संग्राम चचा कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव द्वारा सपा सुप्रीमोें की इजाजत से पार्टी के अंदर माफिया डान मुख्तार अंसारी की कौमी एकता पार्टी का सपा में विलय की घोषणा करना और बाद में भतीजे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा संसदीय बोर्ड की बैठक से उसे खारिज करा देने को लेकर चल रहा है। नेताजी मुलायम सिंह की पहले हाॅ और बाद में अखिलेश के सख्त तेवर के बाद न से चचा शिवपाल सिंह यादव की 30 वर्ष की राजनीति के साख पर बट्टा माना जा रहा है। इसी कड़ी में शिवपाल सिंह नाराज होकर रोजा इफतार पार्टी के आयोजन के बाद इटावा निकल गये। राजनीति में एक दूसरे से दूरिया बनाने वाले शिवपाल यादव इटावा पंहुच जाते है और भाई प्रोफेसर रामगोपाल लखनऊ के वीवीआईपी गेस्ट हाउस में मौजूद रहते है। मुलायम सिंह की अचानक तबियत खराब होती है उन्है पीजीआई में भतीं कराया जाता है। उसके बाद मुख्यमंत्री अखिलेश का लावलश्कर पीजीआई इमरजेंसी पंहुचता है। निदेशक कपूर मुलायम सिंह की तबियत ठीक होने की बात कहते है नेता जी रात दस बजकर 25 मिनट में फिर अपने आवास आ जाते है। इसके बाद नाराज चचा को मनाने का सिलसिला शुरू होता है। लेकिन चचा की नाराजगी इतनी थी कि वह राजभवन में शपथ समारोह व मुख्यमंत्री आवास में हिण्डन नदी वाले कार्यक्रम में नहीं पंहुचते है। शपथ के पहले मुख्यमंत्री का फोन चचा के पास मान मनौब्बल के लिये सुबह 8 बजे इटावा जाता है लेकिन चचा शिवपाल फोन पर नाराजगी का इजहार करके फोन काट देते है। बाद में दोपहर दो बजे तक शिवपाल का हैलीकाॅप्टर अमौसी उतर जाता है वह सीधे ताज होटल जागरण फोरम के कार्यक्रम में पंहुच जाते है। बाद में देर शाम अपने कोपरेटिव के कार्यक्रम के बाद सीधे अपने आवास पंहुच जाते है। दरबाजे बंद हो जाते है फोन उठाने का सिलसिला रूक जाता है। और चचा की नाराजगी मुख्तार अंसारी प्रकरण को लेकर मौन रूप से जारी रहती है। सूत्र बताते है कि शिवपाल सिंह 29 जून को राजधानी लखनऊ में पार्टी द्वारा पहली बार बड़े तौर प्रोफेसर रामगोपाल यादव के जन्मदिन का आयोजन कर रही है। इस मौके पर एक किताब का विमोचन होना है। नेता जी मौजूद रहेगें लेकिन शिवपाल सिंह इस बड़े कार्यक्रम से भी अपनी दूरी बनाकर चलेगें। वह उस दिन राजधानी में नहीं रहेगें। इस प्रकार एक बड़ी पार्टी का परिवारिक कलह पूरी तरह से विक्रमादित्यमार्ग व कालीदास मार्ग से होता हुआ इटावा सैफई तक पंहुच गया है। अब यह कब शांत होगा यह तो नेताजी को तय करना है।


news portal lucknow

सभी दलों के लिये चिंतनीय विषय
प्रभात त्रिपाठी
10 Jun 2016
राजनीति कांेई मदारियों का खेल नहीं है कि जहाॅ डमरू बजाया वहीं के हो लिये। राजनीति में सार्वजनिक जीवन में अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिये आपको ऐसे पाक साफ उदाहरण देने होते है जिससे आपके ऊपर कोई उंगली न उठा सके। और आपके विश्वास को जनता समझे। लेकिन कल जिस तरह से विश्वास का बलत्कार हुआ है उसे लोकतंत्र के लिये कालाअध्याय ही कहा जा सकता है। जनता का विश्वास लोकतंत्र को मजबूत करता है। लेकिन आज जनता से किसे लेना देना। उसे अपने हित का पहले ख्याल रहता है। आप पाच साल के लिये जनता से चुन कर किसी दल के सिंबल से विधानसभा में आते है। लेकिन अचानक आपके निजी स्वार्थ के चलते आपकी प्रतिबद्वता अपनी पार्टी से समाप्त हो जाती है। चाहे पैसा हो या फिर अपना-अपना फला पार्टी में टिकट सुनिश्चत कर लेना आखिर आपने धोखा दिया तो किसे। यह आज सोचना जरूरी है। सभी दलों के लिये आज की इस ऐतिहासिक क्रास वोटिंग के बाद अपने पार्टी फोरम में आत्ममंथन करने की जरूरत आ पड़ी है।। जीत-हार तो होती रहती है।मेरा मानना है कि अगर आपकों पार्टी से नाराजगी है तो आप उसे पार्टी फोरम में तय करे। क्रास वोटिंग करना एक दण्डनीय अपराध जनता की अदालत में माना जाना चाहिये। दलबदल कानून भी इस देश में लागू है। लेकिन उसका पालन इन जनप्रतिनिधियों के साथ कड़ाई से नहीं हो पााता। यूपी के राजनेतिक इतिहास में विधानपरिषद के इस चुनाव में जिस तरह से अवशरवादी लोगों ने जमकर क्रास वोटिंग का नजारा पेश किया वह आने वाले लोकतंत्र के लिये काला अध्याय कहा जा सकता है। भाजपा हो या बसपा अगर यह दोनों दल आज खुश है कि उनके-उनके प्रत्याशी जीत गये या फिर हमने निर्विविरोध चुनाव नहीं होने दिया यह एक लोकतंत्र के लिये स्वस्थय संकेत नहीं है। लोकतंत्र में राजनीति के मायने अब बदल गये है अब राजनेतिक मायने हो गये है कि जिसने नहीं दिया दूसरे के हो लिये। अपना-अपना भविष्य तलाशने वाले जनप्रतिनिधियों ने यूपी के विधानपरिषद चुनाव में जो तस्वीर पेश की है वह काफी भयावह है। लोकदल में तो पूरी लोकदल क्रास वोटिंग का शिकार हो गई है। वहीं समाजवादी पार्टी को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है कि आने वाले विधानसभा चुनाव के पहले जो उनके अंदर विभीषण मौजूद है उन्है पार्टी से बाहर करे। पश्चिमी यूपी में मुस्लिम व ब्राहम्मण विधायकों ने जिस तरह से पार्टी के साथ बगावत की है उसे सपा सुप्रीमों को गंभीरता से लेना होगा। क्योकि अगर सपा को अपना परचम फिर लहराना है तो उसे भाजपा के साथ-साथ बसपा को भी कटघरे में खड़ा करना होगा। इसके साथ ही उसका जो भाजपा के साथ अंदरूनी गठवंधन है इसकी तस्वीर निकल कर सामने आती है वह सपा के लिये दुखदाई साबित हो सकती है। कुल मिलाकर सपा के लिये खतरे की घंटी जादा है जिसे वक्त रहते ठीक करना होगा। भाजपा भी जादा उत्साहित न हो कि उसने 9 क्रास वोट अपने पाले में डालकर कोई तीर मार लिया है। उसे यह समझना होगा कि आखिर हमेशा चुप रहने वाली बसपा ने दस बोट कहा से जुटाये। बसपा को गंभीरता से लेकर सपा को अपनी रणनीति नये सिरे से बनानी होगी तभी समाजवादी सरकार फिर सत्ता में वापसी कर सकती है। पार्टी के विभीषणों को बाहर का रास्ता दिखाते हुये उन लोगों पर भी कठोर कार्रवाई करनी होगी जो इन विभीषणों कों सरंक्षण दिये है। पार्टी के अंदर कई ऐसे नेता मौजूद है जिनके दाॅत खाने के कुछ और है और दिखाने के कुछ और। सपा सुप्रीमों को राज्यसभा चुनाव के बाद कुछ कठोर निर्णय लेने होगें उसमें चाहे अपने ही क्यों न पाटी्र से बाहर किये जाये।


news portal lucknow

‘‘नये चुनाव हों जिससे फिर एकता और विष्वास वाहाल हो’: प्रभात कुमार त्रिपाठी
प्रभात कुमार त्रिपाठी
01 Sep 2015
महत्वपूर्ण सुझाव और अपील

मेरे प्रिय साथियों

‘‘नये चुनाव हों जिससे फिर एकता और विष्वास वाहाल हो’’ः प्रभात कुमार त्रिपाठी

आज मैने एक पत्र जारी करने के लिये कहा था जिसमंें कुछ खुलाषा करने की

बात कहीं थी। कटुता न फेले इस लिये मे उनका नाम नहीं दे रहा हूॅ। मे एकता

का प्रयास कर रहा हूॅ न कि विखराव का। इस लिये अपने सभी 614 पत्रकार

भाईयों व पूरे प्रदेष के वह पत्रकार भाईयों के लिये यह अहम अपील जारी कर

रहा हूॅ जो मेरे वजूद और विष्वास को हमेषा से देखते आये है। साथियों ‘सच

का साथ सभी देते है जो वाकई समाज में सच सुनना और देखना पसंद करते है।

षडयंत्र कारी हमेषा षडयंत्र रचते है और आपनी मठाधाीषी को बनाये रखने के

लिये कुछ चेहरों का इस्तेमाल करते है। पिछले करीब चार दषकों से चली आ रही

यूपी की उत्तर प्रदेष राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति पत्रकारोें की

कमेटी का जो चीरहरण चुनिंदा तीन चार सीनियर पत्रकारों के आपसी हित तथा

स्वार्थो के चलते हुआ है उनके मे नाम नहीं प्रकाषित करना चाहता हूॅ। सभी

लोग जानते र्है कि वह लोग कौन है। में नाम देकर कड़ुआहट नहीं फैलाना

चाहता। मेरा मकसद सिर्फ सच बात अपने फोरम में रखना है। मानना या न मानना

फोरम के सम्मानित साथियों का काम है। उन तीन चार लोगों ने अपनी जिद्द व

अहंकार के चलते पत्रकारों को चैराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। यह स्थित

सुखद नहीं है। मै एकता चाहता हूॅ न कि विखराव। मुझे दोनों चुनाव में रहने

का मौका मिला मै किसी गुट का कहा जाऊ ऐसा मैने दोनों जगहो से चुनाव लड़

कर नहीं होने दिया। मुझे इस दौरान कुछ एसे सीनियर पत्रकार भी मिले जो

वास्तव में पत्रकारित के पेषे को सम्मान देना चाहते है न कि किसी गुटवाजी

का नेता बनने की ख्वाईस रखते है। कुछ तीन चार लोगों ने अपनी मठाधीषी

बचाये रखने के लिये कुछ चेहरों का जातिगत आधार पर इस्तेमाल करके अपनी

महत्वता बनाये रखने का चालाकी भरा निर्णय लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि

उनकी यह मंषा अवष्य पूरी हो गई कि उनके इषारे पर कठपुतली की तरह नाचने

वाले चेहरे चुनाव के हीरो बन गयेे। वह इस प्रयास में सफल भी हो गये। दो

कमेटी बन गई दो अध्यक्ष हो गये और कई पदाधिकारी भी चुन लिये गये। लेकिन

वह जीत कर भी हार गये। उनकी क्या महत्वता रही कि उन्है कल एनेक्सी में

कोई भी मीटिंग नहीं करने दी गई। एक नोटिस चस्पा कर दिया गया कि यहाॅ पर

सिर्फ पढ़ने लिखने की बात हो न कि गुटवाजी और बैठक की। एनेक्सी में बैठने

वाले मीडिया सेंटर को अब कुछ दिनों में बंद करने का भी एलान किया जाये तो

इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योकि हम लोगों ने अपनी आपसी लड़ाई को

दो जगह लड़ कर उन्है खुद मौका दिया है। जो हार गये उनकी क्या महत्वता कम

हो गई वह भी अपना काम कल से षुरू कर चुके है। उन्है भी पत्रकार के रूप

में जाना जाता है। मै किसी तीसरी कमेटी व चैथी कमेटी बना ली जाये जिसकी

चर्चा चल पड़ी है इसकी मजम्मत करता हूॅ। जो लोग यह बात करते है वह चाहते

है कि हम गुट बनाकर फिर उस गुट के नेता हो जाये और पर्दे की आड़ में

मठाधीषी चलाये रखे ऐसा अगर हुआ तो उनमें और हममे फिर अंतर ही क्या होगा।

अगर ऐसा हुआ तो यह दुखद पहलू होगा यूपी की पत्रकारिता के लिये कि यह

कमेटी कई गुटों में विखर जायेगी। इसकी जिम्मेदारी कुछ चुनिंदा ही लोगों

की होगी। में आज अपने साथियों के बीच बात सिर्फ इतनी रखना चाहता हूॅ कि

इस गहरे संकट को बचाने के लिये दोनों कमेटी या तो स्वेच्छा से पत्रकारिता

के हितो/रक्षा/आत्मसम्मान को बचाने के लिये इस्तीफा देकर नया चुनाव कराने

का एलान कर दे। नही तो कुछ दिनों में कुछ नया एलान करने के लिये मजबूर

होना पड़ेगा।

पत्रकार समाज को नई दिषा देने का काम करते है। मेरा नया अभियान आज से

षुरू हो गया है उन 614 पत्रकारों के सम्मान के लिये जो मठाधीषों के इषारे

पर नहीं अपने स्वाभिमान और अपने वजूद से जाने जाते है। हम किसी गुट से ना

जाने जाए हमे अपने नाम से जाना जाए यही माहौल और विष्वास बनाये रखने के

लिये मै आज से ही नये चुनाव की मांग कर रहा हूॅ। जिस दोनों कमेटी के

चुनाव को गुटवाजी भरा चुनाव अहंकार से भरा चुनाव और मान्यता न देने वाला

चुनाव माना जाये वह पूरी तरह से वेइमानी है। ‘‘नया चुनाव’’ फिर उसी रूप

और विष्वास तथा मजबूत भरी पत्रकारिता के लिये जाना जाये जो पुरानी स्थित

को बाहाल फिर से कर सके। मुझे चुनाव नहीं लड़ना है। इस अपील को मेरे उस

भाव से जोड़कर देखा जाये जो मे 614 सम्मानित पत्रकारों के सम्मान को

बचाये रखने के लिये ब्यक्त कर रहा हूॅ जिसके लिये हमारे भाई जाने जाते

है। इसे नेतागिरी से जोड़कर न देखा जाये। मुझे कोई सरकार/मुख्यमंत्री को

अपना चेहरा नहीं दिखाना है कोई ऐसा काम नहीं कराना है जो करोड़ो के

आंकड़े से जुड़ा हो। मेरा प्रयास है कि सिर्फ नये स्वरूप/नये विष्वास और

पत्रकारिता के इस गहरे संकट को दूर करना है। मेरा यह पत्र और प्रयास उन

सभी लोगों को यह बताने का है कि एकता में ही मजबूती होती है। सरकार हो या

फिर हमारा समाज हो या फिर कोई भी स्तंभ हो अगर हम एक है तो हमे मजबूती

भरी निगाहों से देखा जाता है। अगर हम विखराव में है तो इसका फायदा कुछ

लोग उठाने का काम करते है। मेरा कहना है कि गुटवाजी या फिर किसी के इषारे

पर हम अपनी बनी बनाई समाज में इज्जत को चैराहे पर नीलाम नहीं होने देगें।

आज एनेक्सी में नोटिस चस्पा हुआ है कल को एनेक्सी का वह हाॅल जहाॅ हम सभी

लोग एक दो घंटे बैठकर आपस में बातचीत और चायपान करते है हमारी गुटवाजी के

चलते बंद हो जाये। अगर ऐसा होता है तो वह हमारे सम्मान के लिये काफी घातक

होगा। ऐसी स्थित आये उसके पहले ही हम लोगों को एक नई पहल का स्वागत करते

हुये नये चुनाव का एलान स्वंय करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम कुछ

दिनों बाद सभी पत्रकारों का आहवाहन करके एक बैठक किसी अन्य

स्थान(एनेक्सी/विधानसभा मीडिया सेंटर छोड़कर) जहाॅ पर सभी आ सके बैठ कर

खुद एक नई चुनाव की तिथि का एलान करके नये चुनाव का विगुल बजा दिया

जायेगा। जो सभी के लिये हितकर होगा। मेरे कुछ निम्न विदुंओं पर सुझाव है।

विन्दु इस प्रकार से है।

1,नये चुनाव में इस बार कोई मतदाता ष्षुल्क 100/10 रूपये नहीं लिया

जायेगा। सभी साथियों के सूचना के मान्यता कार्ड से ही उसे वोटर मानकर

मतदान करने दिया जायेगा। पिछले चुनाव में कई मतदाता कार्ड होने के वाबजूद

मतदान नहीं कर सके। क्योकि उनका पैसा नहीं जमा था। जिसमें एक महिला थी जो

तीन घंटे बैठी रही और मतदान नहीं कर सकी। जो गलत है। यह कोई संसद या

विधानसभा का चुनाव नहीं है। यह सिर्फ आपसी भाईचारे का चुनाव था। लोकतंत्र

में ऐसा नहीं होना चाहिये।

2, कोई मठाधीष अपने स्वंय द्वारा चुनाव आयोग का गठन नहीं करेगा। यह लोग

हमेषा से उन्ही अपने गु्रप के लोगों को आयोग में बैठा कर चुनाव करा लेते

है जिससे यह पूरा बबाल खड़ा हो गया है। लोग आरोप प्रत्यारोप लगाकर फर्जी

चुनाव की बात कर रहे है। सभी नये पुराने पत्रकारों से हटकर कोई तीसरे को

चुनाव की जिम्मेदारी दी जाये जिससे उसकी विष्वसनीयता पर सवाल न खड़े हो।

ऐसे लोग चुनाव कराये जो समाज से जुड़े लोग हो।

3, ईवीएम मषीन से चुनाव क्यों नहीं। 614 मतदाता है। समय लगता है। फर्जी

मतदान का आरोप भी न लग सके इसके लिये ईवीएम मषीन का प्रयोग हो और आपसी

विष्वास को फिर से बाहाल किया जा सके।

मेरा मानना है कि अगर इन प्रयासों से कुछ दिनों पूर्व टूट चुकी (दो गुटों

में बटी कमेटी) उत्तर प्रदेष राज्य मुख्यालय संवाददाता समिति का पुराना

स्वरूप नये स्वरूप में पारदर्षी एकता और मजबूत संगठन के रूप में वापसी कर

सकेगा तो मेरा यह प्रयास सभी उन 614 साथियों के उस सम्मान को फिर वाहाल

करने में कामयाब होगा जो हमेषा से था। मुझे अत्यंत खुषी होगी। सभी

साथियों से माफी चाहता हूॅ कि इसे राजनीति से जोड़कर न देखे इसे अपने

एकता के मजबूत स्वरूप से जोड़कर देखे। अतीत पर हमे झांक कर देखना चाहिये

लेकिन आने वाले कल के लिये मजबूत प्रयास करते रहना चाहिये यही मेरा मकसद

है। ईष्वर मुझे अपने मकसद में आप सभी के स्नेह और प्यार से जरूर कामयाब

करेगा। आप इस अपील पर अपना सुझाव अवष्य दे। धन्यवाद।

आप सभी का अपना भाई

प्रभात कुमार त्रिपाठी

राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता

संयोजक

पत्रकार एकता मंच

मो0 9450410050


news portal lucknow

याकूब मेमन की फांसी पर बबेला क्यों, न्यायपालिका पर सवाल उठाना गलत!
प्रभात त्रिपाठी
30 Jul 2015
गुरूवार को देश में दो अलग-अलग शवों को सुपुदे-ए-खाक किया गया। एक पार्थिव शरीर था इस देश के एक महान सपूत का जिसके सामने पूरा देश नतमस्तक हो कर रो रहा था वह महान सपूत थे भारत के मिसाइल मेन एपीजे अब्दुल कलाम जिन्है ठीक 11 बजे उनके पेतृक गांव रामेश्वरम् के पास सुप्रर्दे-ए-खाक किया गया। लेकिन वहीं दूसरी तरफ एक ऐसे खुंखार आतंकी को जमीदोंज कर दिया गया जिसने मुम्बई बम काण्ड में लगभग तीन सौ लोगों को मौत के घाट उतार कर आतंकी मंजर इस देश में पेश किया था। और 22 साल की कानूनी लड़ाई का लिबादा ओढे इस देश की कानूनी प्रक्रिया से बचते-बचते आखिरकार सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर जल्लादों द्वारा फांसी के फंदे पर झुला दिया गया। इस घटना से बेगुनाह आत्माओं को एक ऐसी खामोश शांति मिली जिसको यहाॅ पर ब्याॅ नहीं किया जा सकता। मौत होती है एक शान की मौत! जिस पर इंसानियत रोती है। तो दूसरी मौत होती है गद्दारों की तरह देशद्रोही की मौत जहाॅ पर खौफ होता है। मौत का अंतर सिर्फ इतना होता है कि नेक दिल इंसान के लिये देश रो रहा होता है। वहीं दुसरी मौत का मंजर काफी भयावह होता है कि उसे फांसी के फंदे पर झुला दिया जाता है। मुम्बई बम काण्ड ने पूरे विश्व को हिला कर खास तौर पर भारत की आर्थिक नगरी को 1993 में तहस-नहस कर दिया था। हम उस खूनी मंजर को कैसे भूल सकते है जब हजारों बेगुनाह लोग बमों के शिकार हो गये थे। किसी ने अपना पिता खोया तो किसी ने अपना पति और किसी ने अपना भाई। आतंकी दया का पात्र कभी नहीं हो सकता? उस पर दया करने का मतलब है कि हम उसे अपने वजूद में पाॅल-पोश कर बड़ा कर रहे है। सभी मुसलमान आतंकी नहीं होते ऐसा मेरा मानना है। सभी मुसलमान देशद्रोह भी नहीं होते। कुछ मुसलमान इंसानियत के दुशमन होते है जो पूरी कोम को शक की निगाहों से देखने के लिये मजबूर कर देते है। आतंक का कोई मजहब और धर्म नहीं होता। उन पर दया नहीं की जा सकती। जब दया नहीं तो दया याचिका का भी कोई मतलब नहीं होना चाहिये।

याकूब मेमन पर मचा बबेला कहीं न कहीं हमारी कूटनीतिक व राजनेतिक विफलता कहीं जा सकती है। देश के कानून पर सवाल उठाने वालों को कतई बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिये। लोकतांत्रिक देश में अगर आपको बोलने की आजादी है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप समाज में कुछ ऐसा बोल जाये जो किसी धर्म और जाति तथा इंसानियत को शर्मशार कर जाये। आज जिस तरह से कांग्रेस के दो नेताओं के ट्विीट याकूब मेमन की फांसी के बाद आये उसकी कड़े शब्दों में निंदा की जानी चाहिये। आपके विचार समाज मे राजनीति से परे होने चाहिये। क्योकि याकूब मेमन की फाॅंसी का मामला काफी संवेदनशील मामला था। करीब 275 लोगों की मौत से खौफनाक मंजर से जुड़ा था। किसी भी आतंकी के लिये दया नहीं की जा सकती उसके बचाव करने वाले कहीं न कहीं उसके साथ खड़े नजर आते है। हमे न्यायपालिका का सम्मान करते हुये कोई ऐसा ट्वीट नहीं करना चाहिये जिससे किसी अन्य लोगों की भावनाएं आहत हो। हमे न्यायापालिका का पूरी तरह से सम्मान करते हुये उसके लिये कुछ भी बोलने से पहले यह सोचना चाहिये कि हम क्या बोल रहे है। बोलने की आजादी का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी बोले। सभी राजनेतिक दलों को अपनी मर्यादा में रहते हुये और खास तौर से चाहे जनप्रतिनिधि ही क्यों न हो उन्है मर्यादित रहना चाहिये। आतंकी को किसी धर्म और मजहब से जोड़कर नहीं देखना चाहिये। उसने आतंक फैलाया है वह दया का पात्र नहीं है उसकी तरफदारी करने वाले के साथ भी वहीं सुलूक होना चाहिये जो आतंकी के साथ कानूनी रूप से किया जाता है। ऐसा मेरा मानना है। यह राय मेरी अपनी निजी राय है इससे समाचार पत्र का कोई मतलब नहीं है।

धन्य है हमारी सुप्रीम कोर्ट और धन्य है उसमे बैठने वाले चीफ जस्टिस और जस्टिस जिन्हौने एक ऐसे ब्यक्ति को न्याय दिलाने के लिये रात तीन बजे से लेकर पांच बजे तक सुनवाई की जो पूरे विश्व में एक न्याय दिलाने के लिये अन्य देशों के लिये नजीर बन गई कि भारत के अंदर स्वस्थय कानून पाने के लिये न्यायपालिका अभी भी आम आदमी के लिये इंसान के लिये मौजूद है। लेकिन हैबान बने आतंकी को भी कानून के उन लोगों ने अंतिम समय तक बचाने का प्रयास किया जिसे सही भी कहा जा सकता। यह एक अच्छी बात है। लेकिन मौका देना और उसकी तरफ दारी करना या अपनी बात करके समाज को नीचा दिखाना एक अलग बात है इसकी जितनी भी निंदा की जाये कम है। हम शरूर साहब से पूछना चाहते है कि वह किस चेहरे से आतंकी का बचाव और न्यायपालिका के निर्णय का विरोध कर रहे है जिसके हाथ खुद खून से अपनी पत्नी की हत्या में रंगें हो उसे फांसी को खत्म करने की बकालत करना शौभा नहीं देता। थरूर साहब आप भी आने वाले समय में फांसी के फंदे पर जा सकते है। अगर सही जांच हो जाये। क्योकि आपने अपनी उस पत्नी को होटल में मार दिया जो अब समाज के सामने बोल नहीं सकती। उसे भी न्याय मिलेगा भले देर सबेर आप भी जेल के अंदर जायेगें ऐसा मेरा मानना है।। चैनल पर बैठ कर और शोसल मीडिया पर ट्वीट करने से काम नहीं चलेगा। अगर आप सही मायने में फांसी की सजा को भारत से खत्म कराना चाहते है तो आप जनमत तैयार कीजिये। संसद में बोलिये चैनल में बैठकर लम्बी-लम्बी बाते करके किसी आतंकी को देश से बड़ा मत बनाईये। मै खास तौर पर कांग्रेस एक और नेता दिग्गविजय सिंह से भी सवाल करना चाहता हूॅ कि आखिर उन्है जो बीमारी ट्विीट करके बबेला खड़ा करने की है उन्है यह सोचना चाहिये कि याकूब मेमन का मामला राजनेतिक नहीं है। वह राजनीति पर जरूर अपनी राय रखे लेकिन खुखांर आतंकी की बकालत न करे जिससे किसी की भावनाये आहत हो या फिर न्यायपालिका का उपहास हो। संभलकर बोले जयहिन्द-जयभारत।


news portal lucknow

यूपी की जनता के श्रवणकुमार अखिलेष...: प्रभात त्रिपाठी
प्रभात त्रिपाठी
15 Mar 2015
यूपी की अखिलेष सरकार के तीन साल का सफरनामा

मै इस आकलन की षुरूआत उस घटना से कर रहा हॅॅू जो इस संसार में अमर हो गई है कि किस तरह से एक श्रवणकुमार ने अपने माता पिता को अपने कंधो पर बैठकार तीर्थ स्थल पर भगवान के दर्षन कराकर पुण्य प्राप्त किया था और अपना नाम एक ऐसे बेटे के रूप में स्थापित किया जिसकी चर्चा सदियों से की जाती है। मै उसी भावना का यहाॅ पर उल्लेख कर रहा हूॅ कि किस तरह से यूपी के मुख्यमंत्री श्री अखिलेष यादव ने यूपी की जनता के लिये बिना स्वार्थ के प्रेमभाव से विकास कार्यो को करके हर वर्ग हर घर्म के लोगों का आषीर्वाद प्राप्त करने का काम किया है। कल जिस तरह से समाजवादी श्रवण तीर्थ यात्रा की रेल को हरिद्वार और ऋिषिकेष के लिये यूपी सरकार के मुखियाॅ अखिलेष यादव ने रवाना किया उससे यह कहा जा सकता है कि हजारों बृद्ध पुरूष और महिलाओं की दुआयें मुख्यमंत्री अखिलेष यादव के इस कार्य से मिली होगीं। समाजवादी पार्टी ने जिस भाव से इस तीर्थ यात्रा को निषुःल्क षुरू किया है उसकी जितनी भी प्रषंसा की जाये कम होगी। राजनीति से हटकर अखिलेष के इस भाव को समझना होगा जिसके लिये अखिलेष जाने जाते है। हर जिलों से उन तीर्थ यात्रियों को इस यात्रा में भेजा गया है जो अपनो से उपक्षित होकर या धन के अभाव में अभी तक तीर्थ यात्रा पर नहीं जा सके थे। मुख्यमंत्री की इस भावना को समझना चाहिये कि उन्हौने इस तरह के आयोजन को करके हजारों माॅओं और पिताओं का आषीर्वाद प्राप्त किया है जो उनके लिये काफी सुखद हो सकता है।

मुलायम सिंह के घर में संस्कारों में पले-बडे हुये षिक्षित अखिलेष यादव आज एक ऐसे पढ़े लिखे युवा संवेदनषील मुख्यमंत्री है जो इस देष के सबसे बड़े सूबे का नेत्त्व करते है। यूपी की अखिलेष सरकार के तीन सालों के सफरनामे पर अगर हम प्रकाष डालते है और उसका आकलन करते है तो यह सरकार सभी मोर्चो पर पूरी तरह से सफल साबित हुई है। 15 मार्च 2012 को भारी बहुमत से युवा मुख्यमंत्री अखिलेष यादव के रूप में यूपी की सत्ता में काबिज समाजवादी पार्टी की सरकार ने जो अपना चुनावी घोषणा पत्र पांच सालों के लिये जारी किया था उसके लगभग सभी काम अखिलेष सरकार ने इन तीन साल के कार्यकाल में लगभग पूरे करने का प्रयास किया है। षिक्षा़-स्वास्थय-सडक और रोजगार के मामले में यूपी की अखिलेष सरकार ने काफी काम किये है। 25 करोड़ जनता के विकास के लिये सरकार ने हर जिले की सड़कों को फोर लेन सड़क से जोड़ कर प्रदेष को विकास की तीब्र गति में ले जाने का श्रेय हम अखिलेष को दे सकते है। अखिलेष ने बच्चों को इंटरनेट की दुनियाॅ से जोड़ने का जो बड़ा काम किया है उससे आलोचना भी उनके काम के सामने बौनी साबित हुई है। विपक्षी आलोचनाओं की बिना चिंता किये हजारों छात्र और छात्राओं को लैपटाॅप बाॅटकर एक क्रांतिकारी काम किया है जिसको अगर सोचा जाये तो यह काम बहुत बड़ा काम माना जा सकात है। लैपटाॅप देना इस सरकार की सबसे बड़ी योजना थी। किसानों व ब्यापारियों के लिये भी मुख्यमंत्री ने काफी काम किये है। किसान बीमा योजना किसान पेंषन जैसे बड़े कामों से सरकार ने मेंड में बैठे किसानों के लिये बड़ा काम किया है। प्रदेष की गढायुक्त सड़केे अब हेमामालिनी के गालों की तरह चिकनी बन गई है। दूर-दराज के गांव अब हाइवे से जुड़ते जा रहे है। सरकार ने नदियों में कई नये पुल देकर गांव और षहर को जोड़ने का बहुत बड़ा काम किया है। स्वास्थय के क्षेत्र में भी कई बड़े काम इस सरकार में हुये है। पांच सौ बैड के कई अस्पताल चालू करके हर बीमार ब्यक्ति के लिये दवाई की मजबूत ब्यवस्था इस सरकार ने गरीबों को उपलब्ध कराई है। षिक्षा के क्षेत्र से लेकर महिलाओं व विकलांग लोगों के लिये भी इस सरकार ने कई काम किये है। सैंकड़ो पुल बनाने का काम भी इस सरकार ने किया है। कई योजनाओं के लिये जमीन खरीदने के लिये किसानों से जमीन अधिग्रहण भी अगर किया है तो किसानों की मर्जी से किया है। वकीलो के लिये भी इस सरकार ने काफी काम किया है। सुरक्षा के लिये भी 1090. की डाॅयल सेवा को चालू करके महिलाओं को सुरक्षा देने का महत्वपूर्ण काम किया है। राजधानी में मुख्यमंत्री की सबसे महत्वकांक्षी योजना मेट्ो पर काम करके मुख्यमंत्री ने यूपी की राजधानी की जनता के लिये बड़ी सौगात दी है। चक गजरिया फार्म में एक बड़ी आईटी सिटी व राजधानी में जनेष्वर मिश्र पार्क देकर राजधानी की जनता के लिये एक बड़ा काम किया है। गोमती नदी को स्वच्छ बनाकर उसे विदेषी तर्ज पर स्थापित करने की योजना भी पर्यटन के क्षेत्र में बड़ी योजना मुख्यमंत्री ने बनाई है। 40 लाख लोगों को समाजवादी पेंषन योजना से जोड़कर मुख्यमंत्री अखिलेष ने काफी बड़ा काम किया है। बेरोजगारों को बेरोजगार भत्ता देकर भी सरकार ने बड़ा काम किया है। 72 हजार षिक्षकांे की भर्ती भी सरकार की बड़ी उपलब्धि है। कुल मिलाकर हर वर्ग व हर क्षेत्र का मुख्यमंत्री ने ध्यान देकर पूरे प्रदेष में विकास की गंगा बहा दी है। रोज सुबह से लेकर षाम तक मुख्यमंत्री पूरे यूपी को मथने का काम तेजी से कर रहे है। राजनीति से हटकर मुख्यमंत्री के इस प्रषंसनीय कार्य की तारीफ की जानी चाहिये।

मेरा साफ मानना है कि मर्मस्पर्षी मुख्यमंत्री अखिलेष यादव काफी संवेदनषील मुख्यमंत्री है। वह बिना सोचे हर वर्ग के लिये कुछ भी करने के लिये कमर कष लेते है। यही अदा उनकी युवा कुषल नेतृत्व का गवाह बन जाती है। कुल मिलाकर कल जिस तरह से यूपी की सरकार ने समाजवादी श्रवण तीर्थ यात्रा में एक हजार बृद्ध माताओं और पिताओं को निषुःल्क यात्रा कराई है यह यात्रा वाकई में कोई श्रवणकुमार ही करा सकता है। इस लिये मैने इस आकलन में लिखा है कि अखिलेष यादव यूपी की 25 करोड़ जनता के श्रवणकुमार साबित हुये है। मै उनकी भावना को पहचानता हूॅ। बिना लाग लपेट के मुख्यमंत्री अखिलेष ने हर वर्ग व हर क्षेत्र के लिये कार्य करने का काम किया है। अब उन्है इस राजनेतिक परीक्षा में कोई कितने नम्बर देता है यह बात अलग है। राजनेतिक दलों का काम है आलोचना करना और सरकार का काम है आलोचना से बिना डरे प्रदेष की गरीब जनता के लिये तीब्रता से काम करते रहना। जो सरकार मुस्तैदी से करने में जुटी हुई है। मेरा मानना है कि अखिलेष सरकार को असली नम्बर तो आने वाले 2017 के विधानसभा चुनाव मे प्रदेष की जनता ही देगी। सरकार ने अच्छे काम किये है तो मेरा मानना है कि उसे परिणाम भी अच्छा मिलेगा। कुल मिलाकर पांच साल के कामकाज को युवा मुख्यमंत्री अखिलेष यादव ने अपने तीन साल के कार्यकाल में कर दिखाया है जिसकी तारीफ खुले मन से सबको करनी चाहिये।




news portal lucknow

अब नही तो कभी नहीं...
प्रभात त्रिपाठी
08 Mar 2015
जनाब मोदी जी बहुमत की सरकार के बाद भी आप क्यों डरे हुये हैं अपने एजेण्डे को लागू करने में?

कषमीर में अलगाववादी नेता मसरत आलम की रिहाई पर मचा हाहाकार प्रधानमंत्री मोदी जी के लिये जी का जंजाल बनता जा रहा है। यह विवाद यह साबित करता है कि मात्र नौ महिने के कार्यकाल में ही केन्द्र में मौजूद भाजपा की बहुमत की मोदी सरकार पूरी तरह से विफलता की तरफ अग्रसर होती जा रही है। आज देष के सामने यह सवाल खड़ा होना वाजिफ है कि आखिर किस मजबूरी में है देष के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी? उन्है आखिरी कषमीर में पीडीपी के साथ सत्ता की साझेदारी क्यों करनी पड़ी? किस मजबूरी में मच रहे हाहाकार के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्यों चुप है? कषमीर के मुख्यमंत्री के देष विरोधी इस निर्णय के बाद भाजपा का हिन्दू चेहरा पूरी तरह से बेनकाब होता जा रहा है। प्रधानमंत्री को कष्मीर में सत्ता के साथ क्यों जाना पड़ा यह भी सवाल काफी मुखर हो रहा है। जब भाजपा बहुमत में नहीं थी तो उन्है पीडीपी जैसी सिरफिरी पार्टी के साथ गठवंधन की मजबूरी क्यों आ पड़ी? यह सवाल हर हिन्दुस्तानी भाजपा व मोदी से मांगना चाहेगा जिसके लिये भाजपा पार्टी का देष में जन्म हुआ था। हिन्दुओं की हिमायती माने जाने वाली भाजपा के प्रधानमंत्री मोदी जी अगर इस लेख के बाद तत्काल प्रभाव से पीडीपी की सरकार को कषमीर से विदा नहीं करेगें तो मेरा यही मानना है कि मोदी और मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार में कोई अन्तर नहीं है। सत्ता में आकर सत्ता से चिपके रहना ही पार्टी का मुख्य मकसद होता है। मोदी की इस चुप्पी पर भाजपा से मेरा यही सवाल है कि पार्टी बड़ी है या फिर मोदी। इस पर भाजपा के चोटी केे नेताओं को जवाब तो देना ही होगा।

अलगाववादी उस नेता की रिहाई पर जिस पर कषमीर में हजारों लोगोें की जान लेने का आरोप है और उस पर दस लाख का ईनाम रहा हो उसकी रिहाई पर मोदी का चुप रहना और पीडीपी के साथ गठवंधन जारी रखना मेरे हिसाब से देष के गद्दारों का साथ देने जैसा माना जा सकता है। मै पीडीपी को पूरी तरह से भारत देष की गद्दार व संविधान विरोधी पार्टी मानता हूॅ। आज एक अलगाववादी नेता को जिस तरह से छोड़ा गया है क्या यह गारटीं आगे कोई लेगा कि संविधान की षपथ लेने वाला एक मुख्यमंत्री जब भारत के साथ एक अलगाववादी को जेल से रिहा करके भारत के संविधान का मजाक उड़ा रहा हो तो वह भारत के सर कहलाने वाले कषमीर को पाक के हवाले न कर देे। इसका जवाब में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मांग रहा हूूॅ। मैरा मानना है कि जो मुख्यमंत्री गठवंधन धर्म का पालन न करके एक तानाषाह भरा निर्णय देष और संविधान के विरूद्ध ले सकता हो तो यह सिरफिरा मुख्यमंत्री कल को भारत के सर कषमीर को भी पाकिस्तान के सुपुर्द करके उसका सर कलम करा सकता है। मै कुछ ऐसे षब्दों का प्रयोग कर रहा हॅू जो सही नहीं है लेकिन एक सच्चा देष वासी होने के नाते इन षब्दो का प्रयोग कर रहा हॅॅ। जिससे देष के गद्दारों को चिन्हित किया जा सके। मुख्यमंत्री सईद मेरे हिसाब से देष का गद्दार मुख्यमंत्री है उसे भारत के संविधान से खिलवाड़ करने का काई हक नहीं है ऐसे संविधान विरोधी सरकार और मुख्यमंत्री को तत्काल बर्खास्त करके वहाॅ पर राज्यपाल का कार्यकाल लागू कर देना चाहिये।

भाजपा का जन्म जिस उद्वेष्य के लिये इस देष की राजनीति में हुआ था उसके विपरीत भाजपा के नेता सत्ता हांसिल करने के बाद चलने का काम करने मे लगे है यह खुद भाजपा के लिये चिन्ता का कारण माना जाने लगा है। मोदी जी ने आमचुनाव में जिस तरह से लच्छे दार स्पीच देकर देष की जनता के सामने 120 करोड़ जनता की बात करके केन्द्र की सत्ता में हीरों बनकर उभरे और कांग्रेस की जड़े हिलाकर देष की जनता को उससे मुक्ति दिलाई तो ऐसा लगने लगा था कि अब भारत की जनता के हर मायने में अच्छे दिन आ गये है लेकिन उसके ठीक विपरीत नौ माह के अंदर मोदी का ग्राफ गिरना षुरू हो गया है इस पर मै बेबाक टिप्पणी अपने लेख के माध्यम से इस देष के सामने और भाजपा पार्टी के सामने रख रहा हूॅ। मेरा इस लेख के माध्यम से किसी का अपमान करने का इरादा नहीं है मै तो इस लेख के माध्यम से समाज में मोदी जी और भाजपा को आईना दिखाने के लिये यह लेख लिखा रहा हूॅ। मोदी जी से मेरे कुछ सवाल है जो उन्है नौ माह के कार्यकाल पर मिल रही विफलता तथा देष के कुछ हिस्सों में भाजपा की सरकार के लिये गये गलत निर्णय से खड़े हो रहे है किये जा रहे है।

भाजपा और मोदी जी से मेरा पहला सवाल यह है कि जिस देष की 120 करोड़ की जनता का विष्वास जीतकर मोदी जी सत्तासीन हुये थे वहीं मोदी जी ने कष्मीर में किये गये गद्दारों की पार्टी पीडीपी से बेमेल गठवंधन क्यों किया? जो मादी जी भारत माता की आन और षान के लिये मर मिटने की बात करते रहे है और भारत माता की जय बोलते है वहीं मोदी की गठवंधन की सरकार ने आतंकवादियों की पैरवी करके और करीब 1200 कषमीर की जनता को पत्थर मार कर मौत के घाट उतार दिया हो उसकी रिहाई पर चुपी साध ली है इस पर मोदी जी का हिन्दू प्रेम कहाॅ गया। क्या मोदी जी भी पाकिस्तान एजेण्डे पर चल रही पीडीपी सरकार की हिमायत रहेगें। यह सवाल आज देष के सामने मोदी जी के लिये और भाजपा के लिये सबसे बड़ा सवाल है।

मेरा दूसरा सवाल भाजपा से यह है कि क्या भाजपा अपने हिन्दू एजेण्डे से अलग हो गई है अगर ऐसा है तो भाजपा फिर उसी दोराहे पर खड़ी होने जा रही है जिस दोराहे पर काग्रेस सहित कई अन्य पार्टिया खड़ी है। भाजपा को इस पर गम्भीरता से सोचना चाहये। क्योकि मोदी को दिल्ली सहित कुछ राज्यों में मिली राजनेतिक पराजय की तरफ ध्यान देना होगा।

मेरा भाजपा और मोदी जी से तीसरा सवाल यह है कि आप इस देष की 120 करोड़ जनता के लिये ठोस काम क्या कर रहे है। अगर आप नौ माह की सरकार में इसी तरह से विफलता भरे काम करेगें तो मनमोहन सिंह सरकार और आपकी सरकार में क्या अंतर माना जाये। मनमोहन सिंह पर चुपी रहने का आरोप दस साल की सरकार में लगता रहा और आपके उपर नौ माह में जादा बोलने का आरोप लगता है इसका आपको गम्भीरता से आकलन करना होगा। मेरा मोदी जी से यह भी सवाल है कि जब पाकिस्तान ने मनमोहन सिंह की सरकार में दो सैनिकों का सरकलम कर दिया था तो आपकी भाजपा ने कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार पर पाक से न निपटने की बात कहकर उसे कटघरे में खड़ा किया था आज रोज सीमापार से घुसपैठ और गोलाबारी करके सैकड़ो सैनिकों को मार दिया हो एसे मौके पर अब मोदी की सरकार पाक पर क्या एक्षन ले रही है मोदी जी आपकी यह विफलता नहीं है कि आप पाक के खिलाफ कुछ नहीं कर सके। सबसे ताजा उदाहरण ओबामा को घर बुलाकर उसकी जो षानदार खातिरदारी की है उसके बाद ओबामा ने मोदी को दो टूक ब्यानों से देष के धार्मिक स्वरूप को बचाये रखने की नसीहत दी है उससे मोदी जी आपकी राजनेतिक स्थित काफी खराब हुई है इसका भी आपको जवाब देना होगा। इसके अलावा श्रीलंका में जिस तरह से ताजा ब्यान वहाॅ के प्रधानमंत्री ने मछुआरों के लिये दिया है कि अगर भारतीय मछुआरे श्रीलंका की सीमा पर आते है तो उन्है गोली मार दी जायेगी इस तरह के ब्यान के बाबजूुद आप 10 मार्च से श्रीलंका के दौरे पर जा रहे है। मोदी जी इस तरह की उपजी स्थित के बाद भी आप पाक और अमेंरिका श्रीलंका तथा कषमीर में अलगावदी नेता की रिहाई के बाद चुप क्यों है इन सभी सवालों के जबाब आपको देने होगे।

अंत में मेरा यह मानना है कि मोदी जी जो भाजपा के नायक के रूप में उभर कर देष के एक सर्वमान्य लोकप्रिय नेता की रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके है उन्है सोच समझ कर अब आने वाले समय में निर्णय लेने होगें। मेरा यह मानना है कि मोदी ने जिस बडबोलेपन में अपने सिपहसलारों पर आॅख बंद कर विष्वास स्थापित किया है उसे टटोलने की जरूरत है। भाजपा प्रमुख अमित षाह पर जिस तरह से मोदी ने अतिविष्वास के साथ अपना विष्वास कायम किया है उसकी ओबर हालिंग करनी होगी। संघ के साथ बैठकर अपने सहयोगी संगठन विहिप व बजरंगदल की भावना को भी समझना होगा। संघ अगर भारत को हिन्दू देष बनाने की मांग कर रहा है तो क्या गलत कर रहा है। 120 करोड़ में करीब 75 करोड़ जनता हिन्दू देष की वकालत करता है। मेरा यह मानना है कि अगर एक निर्णय आज से 75 साल पाहले हो गया है आप भी उसका समर्थन करते रहे। देष धर्मनिरपेक्ष देष रहे लेकिन अगर इस देष को हिन्दू देष बनाया जाये तो क्या गलत है। मेरा मानना है कि भाजपा जिस तरह से पहली बार बहुमत की सरकार बनी है तो आप किस डर में बैठे है कि आप यह निर्णय नहीं ले सकते। धारा 370 मंदिर निर्माण और काॅमन सिविल प्रोग्राम पर आप कोई ठोस निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे है। जब आप संसद में विपक्ष के बिना डरे आर्डिनेंस लाकर अपने विधेयक पास करा सकते है तो देष के यह बड़े मुद्दे आप क्यों नहीं निपटाना चाहते है। क्या मजबूरी है इसका जबाब मै भाजपा से मांग रहा हूॅ। क्या भाजपा इस देष की जनता को सिर्फ इन मुद्दो पर फंसाये रखना चाहती है इसका जवाब देना होगा। अगर हम हिन्दू अपने भारत में धीरे-धीरे अल्पसंख्यक जैसी स्थित में आते जा रहे है तो यह एक चिन्ता का कारण माना जा सकता है। मै इन सभी ज्वलंत मुद्दो पर भाजपा और देष के लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी से यह सवाल उनके सामने रख रहा हूॅ। अयोध्या मंे भब्य राम मंदिर का निर्माण अगर भारत में नहीं होगा तो क्या इस्लामाबा पाकिस्तान में होगा।यह सवाल भी मै मोदी की सरकार से पूछ रहा हूॅ। भारत में राम का मंदिर नहीं बनेग इसके बीच में न्यायालय आ जायेगा यह कहाॅ का न्याय है। क्या कोर्ट से मंदिर के निर्माणों के फैंसले होगें यह भी इस देष की 120 करोड़ जनता के साथ अन्याय होगा। मैरा मानना है कि भारत धर्मनिरपेक्ष देष जरूर बना रहे लेकिन हिन्दुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जाना क्या यही भारत की जनता के लिये अच्छे दिन की बात कहीं जाती रहेगी। मुझे इन सभी मुद्दो पर या तो मोदी जी का जबाब

चाहिये या फिर संघ और भाजपा ने मोदी के सामने अपने घुटने टेक दिये है इसका जबाब देष की 120 करोड़ जनता मांग रही है। आतंकवादियों की बात करने वाली पार्टी भारत माता को गिरवी रखने वाली पार्टी मानी जा सकती है ऐसी पार्टी से तत्काल मोदी को किनारा करके पीडीपी नेता के खिलाफ देषद्रोह का मुकदमा चलान का काम करना होगा। मुझे तो कषमीर भारत का अभिन्न अंग होने से दूर होता जाता दिखाई दे रहा है। इस पर अगर तत्काल राज्यपाल कार्यवाही नहीं की गई तो मेरी संभावना को होने से कोई रोक नहीं सकता। कुल मिलाकर मेरा यही कहना है कि जनाब मोदी जी बहुमत की सरकार के बाद भी आप क्यों डरे हुये हैं अपने एजेण्डे को लागू करने में? इसका जबाब हर देष वासी जो हिन्दू है वह आपसे मांग रहा है। इस पर आपका क्या जबाब है। क्या मोदी जी आपने यही अच्छे दिन आने के बायदे किये थे अगर यही अच्छे दिन है तो हमे इस देष में ऐसे अच्छे दिन नहीं चाहिये।इससे ईष्वर ही बचाये। जबाब देना ही होगा। जय हिंद- भारत माता की जय।




news portal lucknow


परिशद चुनाव में मोदी का मैजिक ध्वस्त,सपा की रणनीति कामयाब
प्रभात त्रिपाठी

24 Jan 2015

परिशद चुनाव में मोदी का मैजिक ध्वस्त,सपा की रणनीति कामयाब प्रभात त्रिपाठी
उत्तर प्रदेष जैसे विषाल सूबे की राजनीति में मोदी का मैजिक विधान परिशद के चुनाव परिणाम आने के बाद पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है। सत्तारूढ दल समाजवादी पार्टी ने अपनी सभी आठ सीटे जीतकर मोदी की बढती लोकप्रियता पर सवालियें निषान लगा दिये है। इस चुनाव परिणाम से एक बात पूरी तरह से सच साबित हुई है कि मोदी को यूपी की राजनीति में अब अपने पैर जमाने के लिये कुछ नई रणनीति के साथ विधानसभा चुनाव में उतरना होगा। भाजपा की इस हार को हम बिना रणनीति के जल्दवाजी में लिया गया एक मूर्खतापूर्ण निर्णय कह सकते है। भाजपा को जब पता था कि उसका दूसरा प्रत्याषी किसी भी सूरत मेें नहीं जीत सकता है तो उसे दयाषंकर को उतार कर अपनी पार्टी की भद्द कराने की क्या जरूरत थी। दयाषंकर की हार भले ही हार हो लेकिन मोदी की हार सबसे बड़ी हार मानी जा सकती है। भाजपा के राजनेतिक रणनीतिकारों को इस हार से कुछ सबक लेने होगें। उन्है अगर यूपी जीतना है तो यूपी की गुटवाजी भरी राजनीति को समझना होगा। यूपी की विपक्षी एकता को भी गंभीरता से समझना होगा। सपा-बसपा-कांग्रेस-आरएलडी की राजनीति को अगर समझना है तो यूपी के उन भजपाई नेताओं को दूर करना होगा जो हमेषा की तरह गुटवाजी में जुटे रहते है। 
भाजपा पार्टी को लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह से अन्य राज्योें में लगातार विजयीश्री का परचम फहराया जा रहा था तो उसे यूपी में अपनी इस तरह से विछाई गई राजनीति से दूर रहना था। भाजपा का दूसरा मोहरा पिटने का मतलब मोदी का जो मैजिक पूरे देष में चल रहा था उस पर यूपी भाजपा के नेताओं ने जो हार का बदनुमा दाग लगा दिया है उससे भाजपा को उबरने में काफी समय लग सकता है। मेरा यह मानना है कि अगर भाजपा का प्रत्याषी दूसरा जीतजाता तबभी भाजपा नैतिक रूप से हारी हुई मानी जाती। क्योकि 31 विधायको की जुगाड़ भाजपा ने कैसे की? यह सवाल भी उनसे पूछा जाने लगता। नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा पर खरीद फरोख्त का भी आरोप लगता। दूसरे प्रत्याषी दयाषंकर की हार भाजपा की करारी हार है। 
भाजपा की इस हार के बाद अब समाजवादी पार्टी पर पड़ने वाला राजनेतिक दवाब कुछ महिनों के लिये टल गया है। समाजवादी पार्टी में अखिलेष की बढ़ती लोकप्रियता बरकरार है ऐसा इस चुनाव परिणाम के आने के बाद माना जा सकता है। सपा अपने सभी आठ प्रत्याषी जिताने में तो कामयाब हुई वहीं विपक्षी एकता को एकजुट करने मंे भी कामयाबी मानी जा सकती है। सपा को जिस तरह से कांग्रेस ने पूरी तरह से अपने 28 विधायकों का मत देकर मदद दी है उससे कांग्रेस ने राज्यसभा में मुलायम सिंह द्वारा प्रमोद तिवारी को दिये गये मदद का कर्ज कांग्रेस ने उतार दिया है। सबसे बड़ा सवाल बसपा के तीसरे प्रत्याषी को मिली जीत का है। आखिर कार बसपा को मिले 21 अतिरिक्त मत से बसपा खेमें में खुषी मानी जा सकती है। सभी राजनेतिक रणनीति कार बसपा में क्रास बोटिंग भारी पैमाने पर होने की संभावना ब्यक्त कर रहे थे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। बसपा के मोर्या व नसीमुद्दीन ने अपनी कुषल रणनीति से अतिउत्साहित भाजपाईयों को करारी मात दी है। बसपा में सेंध लगी है लेकिन जितना माना जा रहा था ऐसा नहीं हो सका। एक दो असंतुश्ट विधायक तो रह राजनेतिक दल में होते है इसका फायदा भाजपा उठाना चाहती थी जो नहीं उठा सकी। कुल मिलाकर सपा-बसपा-कांग्रेस की इस चुनाव में एकजुटता भी भाजपा की करारी पराजय का मुख्य कारण माना जा रहा है। 
कुल मिलाकर विधानसभा उपचुनाव से लेकर छावनी चुनाव व परिशद के चुनाव में भाजपा को मिली करारी पराजय से यूपी की राजनीति में भाजपा को गहरा आत्ममंथन करना होगा। क्योकि भाजपा जिस तरह से लोकसभा चुनाव के बाद कई राज्यों में लगातार अपना परचम लहरा कर उसके रणनीति कार काफी खुष हो रहे थे उसे यूपी की राजनीति की नब्ज को समझना होगा। ऐसा मै इस लिये लिख रहा हूॅ कि यूपी की राजनीति अन्य राज्यों से भिन्न है। यहाॅ पर अब भी जातिगत आधार पर बोट डाले जा रहे हैं। यहाॅ पर धर्मनिरपेक्ष और साम्प्रदायिक ताकतों के आधार पर चुनाव लड़ा जाता है। मोदी के राजनेतिक रणनीतिकारों को इस हार के बाद गहरा आत्ममथंन करना होगा। तभी वह 2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत के सपने देख सकते है? ऐसा मेरा मानना है। मेरा यह भी मानना है कि सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी को उपचुनाव में मिली विजय व परिशद में विपक्षी एकता के एकजुटता के बाद साम्प्रदायिक ताकतों को हराने के बाद जादा खुष नहीं होना चाहिये। क्योकि परिशद के चुनाव की रणनीति अलग है और विधानसभा चुनाव की रणनीति अलग होती है। जो भी आठ बोट क्रास बोटिंग के आधार पर भाजपा के पाले में गये है वह इसी का संकेत दे रहे है कि जो असंतुश्ट है उन्है पार्टी मनाये और उन पर विष्वास कायम करे। इस लिये सत्तारूढ़ पार्टी को इस जीत से जादा खुष नहीं होना चहिये। मेरा साफ नजरिया है कि वर्तमान समय में यूपी भाजपा के नेताओं को मोदी के सहारे न रहकर अपने यूपी के संगठन को और मजबूत करके जातिगत आधार पर अपने आधार को और मजबूत करे तभी वह 2017 के मिषन को छू पायेगें। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री अखिलेष के कुषल मार्गदर्षन के बाद सपा की स्थित अभी पार्टी व सरकार में काफी मजबूत मानी जा सकती है। लेकिन अभी उन्है आने वाले समम में अपनी पार्टी के ही जयचन्द्रों से सावधान रहना होगा। और उन नेताओं पर लगाम लगाते हुये जनता के बीच जाने के लिये प्ररित किये रहना होगा। तभी सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी अपनी सरकार को फिर से सत्ता में लाने की राह देख सकती है। इस जीत के परिणाम के बाद से सपा को जादा उत्साहित होकर ओवर काॅन्फीडेंस में नहीं आना चाहिये। सरकार के सफल कामकाज व विकास की राजनीति पर सपा पार्टी को आगे जादा ध्यान देकर भाजपा को सत्ता से दूर रखने के काम को करना होगा। तभी यूपी की राजनीति में मोदी के मैजिक और तिलस्म को समाजवादी पार्टी तोड़ सकती है।


news portal lucknow

मुलायम विपक्षी दलो के सर्वमान्य नेता : प्रभात त्रिपाठी
प्रभात त्रिपाठी
22 Dec 2014
संघ के एजेण्डे पर चल रही देष की मोदी सरकार से अगर इस देष में दो-दो हाथ करने के लिये कोई सर्वमान्य नेता है तो उसका नाम है मुलायम सिंह(नेता जी) यह अब पूरी तरह से तय होता जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2014 में भले ही यूपी से अपनी राजनेतिक जमीन गंवाने वाले सपा मुखियाॅ मुलायम सिंह लोकसभा में कमजोर हो गये हो लेकिन देष की राजनीति में उनका लोहा कई राजनेतिक दल अब भी मानते है। मुलायम ंिसह पिछले दो दषकों से देष में तीसरे मोर्चा को बनाने व उसको मजबूती प्रदान करने की कबायद में लगे रहे और उन्है कई दलों के नेताओं के आपसी स्वार्थ के चलते सफलता हाथ न लगी हो लेकिन आज की बदलती राजनीति में उन्ही राजनेतिक दलो के नेताओं को अब मुलायम सिंह के राजनेतिक कौषल से हाथ मिलाने को मजबूर होना पड़ा है और उन्है अपना सर्वमान्य नेता स्वीकार करना पड़ा हो यह देष की आने वाली राजनीति का एक नया सूत्रपात कहा जा सकता है।

मोदी से दो-दो हाथ करने के लिये मुलायम सिंह ने जिस तरह से यूपी की राजनीति में अपनी जमीनी पकड़ बनाये रखते हुये अपना चरखा दाॅव चलाये रखा है उससे देष की राजनीति में सेक्युलर राजनीति पूरी तरह से जिंदा बनी हुई है। साम्प्रदायिक ताकतों से लोहा लेने के लिये मुलायम सिंह एक मजबूत योद्वा के रूप में भी जाने जाते है। पिछले लोकसभा चुनाव में देष की जनता को लुभावने वायदे देने वाले नेता मोदी को बेनकाब करने के लिये जिस तहर से आज जंतर-मंतर में मुलायम सिंह की अगुवाई में जनता परिवार एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ हुंकार भरी है उससे मोदी लहर भी विपक्षी दलों को बाॅट पाने में असफल साबित हुई है।

देष की राजनीति में कांग्रेस का पूरी तरह से पतन होना भाजपा के उदय के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन जिस तरह से मुलायम सिंह ने यूपी में सेक्युलर राजनीति को मजबूती से बनाये रखा है उससे देष की राजनीति में अन्य विपक्षी दलों के नेताओं को आज मजबूर होना पड़ रहा है कि वह मुलायम सिंह को अपना सर्वमान्य नेता माने। वक्त की मजबूरी हो गई है कि अब चाहे दैवगौड़ा हो या लालू,षरद यादव हो या फिर नितिष सभी नेताओं को मुलायम सिंह (नेता जी) पर एक राय से देष में विपक्षी नेतृत्व की कमान देना मजबूरी हो गई है। यूपी जैसे बड़े राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार चलना और राज्यसभा में सबसे जादा 15 सांसद होना सपा की राजनेतिक हैसियत को अपने आप में खुद बयान करने के लिये काफी है।

मुलायम सिंह को जनता परिवार का मुखियाॅ अगर लालू-षरद-नितिष-दैवगौड़ा ने बनाया है तो इसके पीछे मुलायम सिंह की बढती राजनीतिक हैसियत ही कहीं जा सकती है। मेरा साफ तौर पर मानना है कि संघ और भाजपा से अगर कोई दो-दो हाथ कर सकता है तो वह है मुलायम सिंह यादव। क्योंकि मुलायम सिंह की छवि पूरी तरह से आज भी देष में सेक्युलर नेता की बनी हुई हैं। मुलायम ंिसह ने कभी भी साम्प्रदायिक ताकतों का साथ नहीें दिया है। उन्हौने हमेषा साम्प्रदायिक ताकतो का जमकर यूपी हो या लोकसभ उसमें जमकर मुकावला किया है। आज देष की राजनीति में अगर कांग्रेस का पतन हुआ है तो यह दल खुद इसके लिये जिम्मेदार है। कांग्रेस ने हमेषा से उन दलों को ही कमजोर किया था जो दल साम्प्रदायिक षक्तियों से मुकावला करने की हिम्मत रखते थे। कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र को देष की जनता ने खास तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है। जनता परिवार का आज का जतंर-मंतर में मुलायम सिंह की अगुवाई में धरना-प्रदर्षन पूरी तरह से भाजपा की मोदी सरकार को चेताने व जनता के बीच झूठ बोलने की तस्वीर को मजबूती से देष की जनता के सामने रखने में सफलता के रूप में हासिंल करने का काम किया है।

आज देष की राजनीति से लोकसभा में विपक्षी दल को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा न मिल पाना भी एक भयावह लोकतंत्र की तस्वीर को जन्म दे रहा है। जिस देष के लोकतंत्र में विपक्षी दल विखरा हुआ टुकड़ो में विभाजित विपक्ष हो उस देष का लोकतंत्र कमजोर होता है और फिर एक तानाषाह सरकार का जन्म हो जाता है। और वह सरकार तानाषाह के रूप् में काम करना षुरू कर देती है जो देष के लोकतंत्र व संघीय ढांचे के लिये षुभ संकेत नहीं कहा जा सकता। मोदी की छह माह की सरकार मेरे हिसाब से एक तानाषाह सरकार के रूप में चलती दिखाई दे रही है।

मेरा नजरिया पूरी तरह यह कहता है कि देष की राजनीति में अगर लोकतंत्र को मजबूत बनाये रखना है तो उसके संघीय ढांचे को मजबूत बनाये रखते हुये विपक्षी दलों को एकजुट होकर मोदी सरकार को घेरने का काम करना चाहिये। लोकसभा में अगर सरकार को आर्डीनेंस लाकर विधेयक पास कराने पड़े तो उस देष के लोकतंत्र को हम क्या कह सकते है। भाजपा का अगर राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो उसे देष की विपक्षी दलों का सम्मान करते हुये उसकी बात को भी सुनना चाहिये। मुलायम सिंह का जनता परिवार का मुखियाॅ बन जाना काफी नहीं है। मेरा साफ तौर पर मानना है कि अब वक्त आ गया है कि सभी विपक्षी दलों को मुलायम सिंह को सर्वमान्य नेता मानते हुये विपक्षी नेता पद देने की लोकसभा में कबायद षुरू कर देनी चाहिये। जिसमें कांग्रेस-टीएमसी-बीजू जनता दल व बामपंथी को भी अपने समर्थन का एलान करके अपना नेता मान मान लेना चाहिये। सोनिया-राहुल की धार देष की राजनीति से पूरी तरह से खत्म हो चुकी है। मुलायम सिंह के सामने अब कोई ऐसा नेता नहीं है जिसे जमीनी आधार पर एक मजबूत नेता माना जा सके। मेरा राजनेतिक नजरिया यह कहता है कि अगर सभी विपक्षी दल एक मत से मोहर लगाकर देष में चल रही संघ के एजेण्डे में मोदी सरकार का जोरदार ढंग से मुकावला करना है तो मुलायम सिंह को लोकसभा में सर्वमान्य विपक्षी नेता स्वीकार कर लेना चाहिये। मुलायम सिंह में यह दमखम पूरी तरह से है िकवह मजबूती से साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ कर देष के सेक्युलर ताकतों को मजबूत कर सकते है। इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता। कुल मिलाकर जनता परिवार का एकजुट होना देष की राजनीति के लिये आने वाले समय में स्वस्थय संकेत है। सभी नेताओं को अपने-अपने राजनेतिक स्वार्थ त्याग कर अब सेक्युलर बनाम साम्प्रदायिक राजनीति से दो-दो हाथ करने के लिये एक जुट हो जाना चाहिये। और मुलायम ंिसह को इस देष का विपक्षी नेता मानकर उनकी अगुवाई में साम्प्रदायिक ताकतों से लड़ने का विगुल फूंक देना चाहिये। कुल मिलाकर काले धन व धर्मान्तर के मुद्दे पर जनता परिवार का 22 दिसम्बर को जंतर-मंतर में किया गया (आज का एक जुट प्रदर्षन) मोदी सरकार को बेनकाब करने के लिये एक सफल प्रदर्षन कहाॅ जा सकता है।